राँचीः नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी राँची के फर्टिलिटी विशेषज्ञों ने बताया कि 30 साल की उम्र के आसपास की आबादी में फर्टिलिटी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। जहाँ, इनमें से 30 प्रतिशत मामले पुरुषों की इन्फर्टिलिटी के हैं, वहीं 30 साल की उम्र के आसपास महिलाओं के अंडों की संख्या और क्वालिटी में काफी कमी दर्ज की गई है।नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी, राँची में फर्टिलिटी विशेषज्ञ, डॉ. निवेदिता मिश्रा ने कहा, ‘‘पुरुषों में इन्फर्टिलिटी के कुछ मामले मोटापे और डायबिटीज़ के कारण होते हैं। इन्फर्टिलिटी की समस्याओं वाले 30 प्रतिशत पुरुष मोटापे से पीड़ित हैं। इनमें से 20 प्रतिशत पुरुषों को डायबिटीज़, हाईपरटेंशन की समस्याएं हैं। जब खून में शुगर अधिक हो जाती है, तो स्पर्म पर दबाव पड़ता है और उनका कार्य प्रभावित होता है। इसके अलावा, हार्मोन में असंतुलन, विशेषकर कम टेस्टोस्टेरोन के कारण भी स्पर्म के उत्पादन पर असर होता है। धूम्रपान, मदिरासेवन, और लंबे समय तक बैठे रहने से भी पुरुषों की फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है।नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी, राँची में फर्टिलिटी विशेषज्ञों ने बताया कि 30 साल की उम्र के आसपास महिलाओं में अंडों की संख्या कम देखी जा रही है। इससे पहले अंडे तब कम होना शुरू होते थे, जब वो 40 साल की उम्र के करीब पहुँच जाती थीं, लेकिन आज युवा महिलाओं में भी अंडे कम हो रहे हैं। फर्टिलिटी का इलाज कराने के लिए आने वाली हर दस महिलाओं में से चार को एंडोमेट्रियोसिस होता है। एंडोमेट्रियोसिस में आमतौर से गर्भाशय के अंदर विकसित होने वाला टिश्यू ओवरीज़ या पेल्विस जैसी जगहों पर बनने लगता है, जिससे दर्द होता है और गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है। यह सामान्य भी हो सकता है और गंभीर भी। इसके कोई लक्षण प्रकट नहीं होते हैं, इसलिए महिलाओं को यह पता भी नहीं चल पाता है कि उन्हें एंडोमेट्रियोसिस है। एंडोमेट्रियोसिस होने पर माहवारी में दर्द हो सकता है। इसके अलावा, इन्फर्टिलिटी से पीड़ित हर दस महिलाओं में से चार महिलाओं को पीसीओएस होता है।

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