रांची  : कई दंपति महीनों तक गर्भधारण की कोशिश करते रहते हैं। इसके बाद उपचार शुरू होता है, एक चक्र, फिर दूसरा। हर बार रिपोर्ट सामान्य दिखाई देती है, फिर भी परिणाम नहीं मिलता। डॉ. विनीता कुमारी, फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट, बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, रांची का कहना है अक्सर बार-बार असफलता के बाद ही जांच का दायरा बढ़ाया जाता है और तब पुरुष पक्ष की भूमिका स्पष्ट होती है।विश्व स्वास्थ्य संगठन  के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 15 प्रतिशत दंपतियों को गर्भधारण में कठिनाई होती है, और इन मामलों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत में पुरुष पक्ष की भूमिका होती है। इसके बावजूद, पुरुष फर्टिलिटी पर शुरुआती चरण में अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।शुरुआत में ध्यान कहाँ केंद्रित होता है फर्टिलिटी मूल्यांकन की प्रक्रिया में शुरुआती ध्यान अक्सर महिला पर अधिक रहता है। पुरुषों की जांच की जाती है, लेकिन कई बार सीमित रूप में या देर से। इसका एक कारण यह भी है कि पुरुषों में आमतौर पर स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। न दर्द, न कोई बाहरी संकेत। ऐसे में स्थिति सामान्य मानी जाती है और संभावित समस्या शुरुआती चरण में पहचान में नहीं आती। जब रिपोर्ट “सामान्य” लगती है वीर्य विश्लेषण एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक जांच है, लेकिन यह पूरी जानकारी नहीं देता। इसमें मुख्य रूप से संख्या, गतिशीलता और आकार जैसे मानकों का आकलन किया जाता है, जो सीमित स्तर तक ही संकेत देते हैं। इन मानकों के भीतर परिणाम आने का अर्थ यह नहीं है कि सब कुछ पूरी तरह सामान्य है।कई मामलों में बार-बार असफलता के बाद आगे की जांच में शुक्राणुओं के डीएनए स्तर से जुड़ी समस्याएं या अन्य सूक्ष्म कमियां सामने आती हैं। ये कारक निषेचन, भ्रूण के विकास और शुरुआती गर्भधारण को प्रभावित कर सकते हैं।

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