रांची: अप्लास्टिक एनीमिया जागरूकता सप्ताह (1–7 मार्च) की थीम ‘”वॉयसेस ऑफ स्ट्रेंथ एंड होप” है, जिसका मतलब है लोगों को जागरुक करना और उनमें अप्लास्टिक एनीमिया के इलाज को लेकर उम्मीद जगाना। इसके तहत भारत सीरम एंड वैक्सीन्स लिमिटेड (BSV) ने अप्लास्टिक एनीमिया के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए जल्दी जांच, सही समय पर निदान और बेहतर रेफरल सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल करीब 20,000 मामले सामने आते हैं। कई मरीजों की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि जरूरी इलाज जैसे स्टेम सेल ट्रांसप्लांट और इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी तक समय पर पहुंच नहीं मिल पाती। एशिया में इस बीमारी के मामले पश्चिमी देशों की तुलना में दो से तीन गुना ज्यादा देखे जाते हैं। अप्लास्टिक एनीमिया एक गंभीर रक्त रोग है, जिसमें बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में खून की कोशिकाएं नहीं बना पाता। इससे शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स सभी कम हो जाते हैं। इस स्थिति को पैनसाइटोपेनिया कहा जाता है। अस्पतालों के आंकड़े बताते हैं कि पैनसाइटोपेनिया के 20 से 40 प्रतिशत मामलों में अप्लास्टिक एनीमिया पाया जाता है। डॉ. अभिषेक रंजन, डीएम क्लिनिकल हीमैटोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट फिजिशियन, सदर हॉस्पिटल, रांची, ने कहा – “सीमित जागरूकता, जांच में देरी और विशेष डायग्नोस्टिक सुविधाओं तक असमान पहुंच, अप्लास्टिक एनीमिया के प्रबंधन में प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं। कम कम ब्लड काउंट को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। भारत में अक्सर कम ब्लड काउंट को सामान्य कारणों से जोड़ दिया जाता है, बिना पूरी जांच के। अप्लास्टिक एनीमिया के शुरुआती लक्षण आसानी से नजरअंदाज हो सकते हैं, क्योंकि कई मामलों में इसे अन्य प्रकार के एनीमिया समझ लिया जाता है। हालांकि, लगातार थकान, बार-बार संक्रमण, बिना कारण नीले निशान पड़ना या असामान्य रक्तस्राव जैसे लक्षणों पर तुरंत और सही जांच कराना जरूरी है। केवल लक्षणों के आधार पर निदान संभव नहीं है। सीबीपी, डीटेल में किया गया क्लिनिकल मूल्यांकन और बोन मैरो बायोप्सी जैसी जांचें आवश्यक होती हैं ताकि बीमारी की पुष्टि हो सके और अन्य कारणों को खारिज किया जा सके। निदान के बाद, प्रत्येक मरीज के लिए समग्र उपचार योजना बनाई जाती है।” “एप्लास्टिक एनीमिया के प्रभावी इलाज के लिए समय पर, सही और सटीक जांच बहुत महत्वपूर्ण होती है। इस बीमारी के उपचार में जिम्मेदार भूमिका निभाते हुए भारत सीरम एंड वैक्सीन्स लिमिटेड (BSV) देश के कई मेडिकल संस्थानों के साथ मिलकर एप्लास्टिक एनीमिया रजिस्ट्री पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य भारत में इस बीमारी के प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण अंतरालों को समझना और उन्हें दूर करना है। यह रजिस्ट्री देश के प्रमुख संस्थानों के हेमेटोलॉजी रिसर्च ग्रुप के नेतृत्व में चल रही है और वर्तमान में इसमें देशभर के 15 केंद्र शामिल हैं। इसके माध्यम से जांच, उपचार के तरीकों और उनके परिणामों से जुड़ा वास्तविक डेटा व्यवस्थित रूप से एकत्र किया जा रहा है, ताकि बीमारी की बेहतर समझ विकसित हो सके और चिकित्सा ज्ञान में मौजूद कमियों को भी दूर किया जा सके।
एप्लास्टिक एनीमिया जागरूकता सप्ताह के अवसर पर BSV ने सरकार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, मेडिकल संस्थानों और अन्य प्रमुख हितधारकों के साथ मिलकर एक मजबूत व्यवस्था बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जिससे समय पर जांच से लेकर प्रभावी उपचार तक की प्रक्रिया बेहतर तरीके से जुड़ सके।
हम एप्लास्टिक एनीमिया के बारे में जागरूकता बढ़ाने, मरीजों और उनके देखभाल करने वालों की आवाज़ और अनुभवों को सामने लाने, तथा निरंतर चिकित्सा शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक जानकारी और प्रमाणों को बढ़ाने के लिए काम करते रहेंगे। यह प्रयास केवल जागरूकता सप्ताह तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हर दिन जारी रहेगा। आइए, हम सभी मिलकर एप्लास्टिक एनीमिया के खिलाफ लड़ाई को मजबूत बनाएं और इस बीमारी पर नियंत्रण पाने की दिशा में आगे बढ़ें। ” – शिवानी शर्मा डेका, सीओओ, इंडिया बिजनेस, बीएसवी (मैनकाइंड ग्रुप) ने कहा।

भारत में अप्लास्टिक एनीमिया से निपटने के लिए जरूरी कदम:

  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर नियमित हीमोग्लोबिन जांच शुरू की जाए
  • जिन मरीजों का ब्लड काउंट लगातार कम रहता है, उनके लिए साफ रेफरल सिस्टम हो
  • बड़े शहरों के बाहर भी जरूरी जांच सुविधाएं बढ़ाई जाएं
  • बीमारी को बेहतर समझने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर डेटा इकट्ठा किया जाए
  • लोगों को समय पर डॉक्टर के पास जाने के लिए जागरूक किया जाए

अप्लास्टिक एनीमिया किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन किशोर, युवा और बुजुर्गों में यह ज्यादा देखा जाता है। अगर इसका इलाज न हो, तो गंभीर मामलों में कुछ महीनों में जान का खतरा हो सकता है। अब इलाज में सुधार हुआ है, जैसे इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट, जिससे मरीजों की हालत बेहतर हो रही है। फिर भी, समय पर पहचान सबसे जरूरी मानी जाती है।

एनीमिया जागरूकता सप्ताह के दौरान बीएसवी ने कहा कि अगर जांच पर ज्यादा ध्यान दिया जाए, इलाज तक पहुंच आसान बनाई जाए और लोग समय पर जांच कराएं, तो इस बीमारी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है और मरीजों की सेहत बेहतर की जा सकती है।

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