
दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से झारखंड में शोक व गम की लहर
रविंद्र उपाध्याय
रांची : झारखंड में आदिवासी समाज का “सूरज” सोमवार को अस्त हो गया। जंगल-जमीन का नेता यानी दिशोम गुरु अब हमलोगों के बीच नहीं रहे। वे श्रावण मास के प्रसिद्ध दिन सोमवार को स्वर्ग सिधार गए। झारखंड के लोगों के लिए खासकर आदिवासी समाज के लिए गुरुजी का निधन विशेष क्षति है। इसकी भरपाई कर पाना संभव नहीं है। उन्होंने आदिवासी समाज के विकास के लिए बहुत संघर्ष किया। आदिवासी समाज में शिक्षा की क्रांति लाने में शिबू सोरेन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने गांव-गांव, गली-गली घूम-घूम कर आदिवासी समाज को यह प्रोत्साहित करते थे कि हड़िया पीना छोड़ो और हाथ में कलम किताब पकड़ो। आज इसका फलाफल भी देखने को मिल रहा है। आज झारखंड राज्य के आदिवासी बहुल कोई ऐसा जिला नहीं है, जिस जिले में आदिवासी समाज का युवक डीसी-एसपी, बीडीओ-सीओ डॉक्टर और इंजीनियर नहीं है। आज स्थिति ऐसी है कि हर आदिवासी बहुल गांव में अधिकारी मिल जाएंगे। इसका सारा श्रेय गुरुजी शिबू सोरेन को जाता है। दिशोम गुरु ने महाजनी प्रथा के खिलाफ एक ऐसा आंदोलन का बिगुल फूंका कि इसके शंखनाद से पूरा झारखंड गूंज उठा। झारखंड में महाजनी प्रथा को खत्म करके ही शिबू सोरेन ने दम लिया। अलग झारखंड राज की लड़ाई में शिबू सोरेन ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इनके द्वारा शुरू किए गए लंबे आंदोलन का ही प्रतिफल है कि आज यहां के लोगों को अलग झारखंड राज्य का तोहफा मिला। इसके लिए उन्होंने लंबी लड़ाइयां लड़ी।
सिबु सोरेन के निधन की सूचना पाते ही पूरा झारखंड राज्य शोक और गम में डूब गया। लोग गमगीन हो गए। इनके द्वारा किए गए यादों में लोग डूबे हुए हैं, खोए हुए हैं। झारखंड के महान विभूति शिबू सोरेन को रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक “प्रभात मंत्र” परिवार सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
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